खूबसूरती..

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आज सभी चीजों की व्याख्याएं बदल गयी है ( यह बात मैं आगे भी बार बार कहने वाला हूँ ) | कोई भी चीज़ किसीको सुंदर लगे यह उसके दृष्टिकोण पर भी निर्भर करता है | कोई कहता है, “ठीक से देखो तो सारी दुनिया ही खुबसूरत है |”

मगर यह खूबसूरती जो “विषय” है, यह सिर्फ “दर्शन” स्वरुप में ही नहीं है | यह महसूस करने का विषय है |

एक कार्यशाला में निर्देशन के बारे में उमेश कुलकर्णी ने बताया था की, “निर्देशन के लिए एक अलग ही दृष्टिकोण चैहिये | अगर आप सच्चे कलाकार हो तो आप को उस विशिष्ट चीज़ में कोई खूबसूरती तो ज़रूर दिख ही जाएगी | कोई भी पुरानी वास्तु, या फिर कोई पपड़ी लगी दिवार |”

कहने का तात्पर्य यह की, वह कोई भी चीज़ हो सकती है बस आपका दृष्टिकोण वैसा होना चाहिए |

तो मैंने मेरे दृष्टिकोण के हिसाब से मेरे खूबसूरती की व्याख्या रची है |

 

खूबसूरती..

खूबसूरती..
जब सुरत खूब लगती है
दिखती है, सुनाई देती है, महकती है, देती है ज़ायका जबान पर
या होती है महसूस छूने पर
मैंने देखी थी
पागलपन में सादगी में
मैंने देखी थी दादी माँ की झुर्रियों में
सुनी थी तब जब नवजात रोता है
महक ली थी जब नया पन्ना किताब का पलटता है
उस वक्त जब अचानक से दोस्त ने हाथ पकड़ कर रास्ता पार कराया
उस दिन जब भूख लगी तो पिताजी के हाथ में स्वाद खूब पाया
बच्चों के गिरे दातोंवाली हंसी और मैले हाथ
और अनजान सफर में अकस्मात अजनबी का साथ
तब होती है महसूस शब्दों की सुंदरता
जब सुनता हूँ तोतली ज़बाँ में कोई स्तोत्र
तब झलक आता है भाषा का भी सौंदर्य
तब भी जब स्याही अनजाने में गिर जाती है
तब जब वह बन जाती है कविता

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