प्रतिशोध..

 

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क्या है हमारी ज़िन्दगी? कितनी सच है और कितनी झूठ? किसी अपनेसे हम “निःस्वार्थ” प्रेम करते है, क्या सच में करते है? क्या सच में हम उससे कोई आशा, अपेक्षा नहीं रखते? और यह बात कितनी भी सच हो फिर भी बदले में वोही प्रेम की अपेक्षाएँ नहीं होती?

यह एक कडवा सच है की हमें मीठे झूठों में जीने आदत ही नहीं हवस लगी है | परिस्थितियों को बदलने की और जीवन को और उत्कृष्ट (उत्कृष्ट की व्याख्या क्या लेंगे?) बनाने की दौड़ (या कहें “नशा”?) में हमारा होश कहीं और रह जाता है | हमें हमारा जीवन, हमारी “खुद” की सोच सबसे निराली और अच्छी लगती है | कुछ लीगों को इसका बहुत घमंड होता है | मगर सच तो यह है की वह अपने “Comfort Zone” से बाहर ही नहीं निकलना चाहते |

इसी सच को छुपाने के लिए, ज़िन्दगी का “प्रतिशोध” इन परिस्थितियों से शुरू रहता है |

यहाँ मनुष्यों के कुछ वर्गीकरण कर मैंने टिका की है? बाद में मुझे लगा की क्या ऐसे अन्य सब पर टिका करना ठीक होगा? फिर, कविता तो असीमित, विश्वव्यापी होती है और इसी समाज का मै भी तो हिस्सा हूँ | तो इसी किसी वर्गीकरण में मै भी गिना जाऊंगा |

फिर भी, अंत में इस “अपराध” से बचने के लिए खुद पर भी टिका कर दी है |

तो ऐसेही हम सोचें और “सच” को ढूंढने का यह दौर जारी रहे |

 

प्रतिशोध..

 

कुछ ज़रूरतें है मनुष्य की

कुछ सच कड़वे आयुष्य के

पता नहीं चलता जीने के नशे में

कहाँ खत्म होती जरूरत है

और कहाँ शुरू होता प्रतिशोध है

 

जो दीन पतित कहलाते

मरते झटपटाते जीते

फिर भी पेट की अग्नि ना बुझती

फिर भी कल्पनाओं की आस ना बुझती

वासनाओं के पीछे आँखें मूंद जाती

 

इमानदार तो वह भी नहीं जो

जीते हैं औरों के ख्वाब

पाते है उच्च वासनाओं की चोटी

और खाते है सुनहरा फिका पकवान

इनकी चाहें कभी नहीं खत्म हो पाती

इनकी बाहें हर बार कुछ नया चाहती

 

और एक भी है ऐसे

जो दोनों से परें

किसी दूसरी दुनिया में पलें

इनको इनका जूनून सताता है

उसको नशे की तरह सर पे सवार करते है

खुद तो अंत तक असंतुष्ट रहते है

फिर भी शिकायतें सबकी जूनून से करते है

 

ऐसे निरर्थक जीवन है

ऐसे कुछ वर्ग है

जो जीते है कुछ

पर हारे हुए से सहमे जीवन

और अर्थहिन से गुजर जाते है

 

यही सच है जीवन की अर्थहिन् प्रतिशोध का

जैसे यह कविता

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