मै कवी..

यह कविता परिचय है, उन सब कवियों का जो “Gifted” है | “Gifted” उनकी प्रतिभा से और “Gifted” इस जगत के लिए | आजकल पेशा (Profession) उससे साबित होता है जब वह व्यक्ति उस कला या हुनर से धन प्राप्ति कर लेता हो | लेकिन मेरे हिसाब से वह व्यक्ति ऐसे किसी बंधन में नहीं होना चाहिए और किसी चीज़ की मोहर नहीं होनी चाहिए उसकी पहचान साबित करने के लिए | अगर कोई चित्र बनाता है तो वह चित्रकार बन जाता है, वैसे ही लिखने वाला लेखक बन जाता है चाहे वह किताबी रूप में छपा हो या कागजों में बिखरा हो |

इसी कारण यह एहसास मेरा परिचय बन गया की मै कवी हूँ | फिर मैं असल में क्या करता हूँ? तो कहीं से कुछ सुनी-सुनाई बातें इकठ्ठा कर उसको सजाता हूँ | मुझे लगता है कोई भी कला विरासत होती है, किसी कलाकार से दुसरे तक | हाँ, व्यक्ति नहीं तो शक्ति के रूप में | उन्हीं सब चीजों का संकलन (Editing) कर वह नई चीज़ बनती है और अपनेआपमें बुनती चली जाती है |

मैंने भी ऐसे ही विरासत से प्रेरणा ली है | संत ज्ञानेश्वर महाराज, तुकोबारायजी से आज टागोर, गुलज़ार, पियूष मिश्रा तक |

इस कविता में अपनाएं हुए सभी शब्द नकारात्मक है | पहला कारण यह, की मै अगर इतना सबकुछ अपना रहा हूँ जो औरों का लिया हुआ है तो मैं गुनहगार भी हो सकता हूँ | दूसरा यह, की कवियों की तरफ देखने का शुरुआती नज़रीया कुछ ऐसाही होता है ( संदर्भ उदहारण – फिल्म “प्यासा”) | लेकिन गौर कीजिएगा अगर इसमें सकारात्मकता लगने लगे तो (कृपया) |

तो यह मेरा परिचय है, और उन सब प्रेरणादायी कवियों को और रसिकोंको समर्पित है जिनके सिवा इन शब्दों का कोई मोल नहीं |

 

मैं कवी

मैं कवी, मैं चोर,

मैं सौदागर

उन शब्दों का उन खयालों का

जो नजरअंदाज कर तुम छोड़ देते हो

और मैं सिमट लेता हूँ उन्हें चुन कर

सजाता हूँ मेरे खयालों से

 

मैं भिक्षुक, मैं शुद्र,

मैं नीच

उठा लेता हूँ अल्फाजों को

जिनसे तुम किनारा कर फेंक देते हो

ओढ़ लेता हूँ अक्षरों की चादर

जिन्हें चिर फाड़ तुम रास्तों पर छोड़ देते हो

मांगता हूँ तुमसे तुम्हारी सोच

और अपनाता हूँ खुद के लिए

 

मैं मुसाफिर, मैं अनजान,

मैं अजनबी

खोजता हूँ कुछ मिले अच्छा भला

ढूंढ़ता हूँ हो सही या गलत

तलाशता हूँ अद्भूत चीजों को

जिन्हें कोई चाहता नहीं

जो नहीं पता

हैं या नहीं

 

मैं दुश्मन, मैं तामस,

मैं धोखेबाज

तुम्हें लपेट के कलम में

तुम्हें तुम्हारी सोच के जाल में

फंसा के शब्दों के जंजाल में

भागूँगा पलक झपकते ऐसे

तुम्हारी ज़हन से सोच

और जुबां से फिसले शब्द जैसे

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